विदेश में मैनेजर का पद छोड़ बनी जैविक किसान

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यूथोपिया में मैनेजर के पोस्ट पर काम करते हुए जब इंदौर में वैशाली जी की माताजी की तबियत कैंसर की वजह से खराब हुई तब वैशाली ने ठाना कि कैंसर की जड़, जो हमारे भोजन / अन्न से जुड़ी है, पर हमला बोलना है| वैशाली भारत वापस आयीं और खंडवा, मध्य प्रदेश में 10 एकड़ ज़मीन पर जैविक कृषि की शुरुआत की| वैशाली किसान परिवार से सम्बन्ध नहीं रखती और कभी सोचा भी नहीं था कि वो किसान बनेंगी| 

जिंदगी में एक समय आता है जब आपको यह एहसास होता है कि जिस शान और शौकत के पीछे आप भाग रहे हो उसका कोई अंत नहीं है|

भारत वापस आकर जब उन्होंने जैविक (organic) कृषि करने का सोचा तो उनका हौसला उनके पति एवं पिता ने बढ़ाया| वैशाली एक बेटी की माँ हैं जो कि आज कल कॉलेज में हैं| आज वैशाली किसान मंडल की प्रमुख हैं, ट्रेनिंग चलाती हैं, महिलाओं के उत्थान पर कार्यरत हैं एवं कई राज्यों से प्रगतिशील किसान की उपाधी प्राप्त कर सम्मानित भी हैं| 

अपने खेत की प्लानिंग बहुत जरूरी है, हमने 10 अकड़ को 1-1 अकड़ के 10 खेत में बांटा है जिससे हमें पैदावार का हिसाब लगाने में आसानी होती है और साथ ही फसल के चक्रिकरण (crop rotation) में आसानी होती है  

शुरुआती संघर्ष 

बाकी लोगों की तरह वैशाली की शुरुआत भी चुनौतियों से भरी रही| सबसे पहले तो जैविक कृषि के ज्ञान का अभाव और दूसरा महिला होकर अपने घर से 200 किलोमीटर दूर रहने की हिम्मत दिखाना| वैशाली बताती हैं कि यह सब इतना आसान नहीं था| सबसे पहले उन्होंने सुभाष पलिकार जी के वीडियो देखकर शुरुआत की और फिर उनके संपर्क में आयीं जहाँ उन्होंने जैविक कृषि के रहस्य सीखे और खेती में उतारा| 

एक जैविक किसान को, भले ही वह कुछ भी पढ़ चुका हो, अपने आप ही खाद, कीटनाशक, जीवामृत एवं घनजीवामृत बनाना आना ही चाहिए

वैशाली ने जाना की जैविक कृषि की सफलता का रहस्य गौ आधारित कृषि करने में ही है| देसी गाय जो भी देती है मल मूत्र इत्यादि के रूप में वह सब धरती के लिए अमृत है| वैशाली बताती हैं कि जो फायदा धरती को देसी गाय के गोबर से होता है वह किसी भी भैंस, जर्सी गाय आदि से नहीं होता| 

अकेले होने के कारण उन्हें काफी समय लग जाता था खेत में काम करने में जिसके लिए उन्होंने आस पास ट्रेनिंग देना शुरू किया और एक सहायक को अपने साथ लगाया| परन्तु इसमें उनका महिला होना एक कमजोरी नहीं थी अपितु वह आस पास की महिलाओं को भी एकत्रित कर पायी ट्रेनिंग हेतु| 

शुरुआती दौर में मल्टीप्ल फसल उगाना काफी मुश्किल लगता था क्यूंकि फसलों और मिटटी के ज्ञान का अभाव था जो कि धीरे धीरे धरती पर काम करके समझ में आया| 

आज मुझे समझ में आया के अगर आप मल्टीप्ल फसल लगाते हो तो उससे क्या फायदा होता है|  जैसे गेंहू के साथ ऐसी फसल लगानी चाहिए जो ऊपर से दो भागों में फटें जैसे दालें क्यूंकि ऐसी फसल मिटटी में नाइट्रोजन की मात्रा बनाये रखती है|

वैशाली बताती हैं कि उनकी पहले साल की फसल जब पक के त्यार हो गयी तो उसमे नुक्सान हुआ क्यूंकि मार्किट लिंकेज नहीं था| बाद में उनके भाई राहुल ने उनका साथ दिया और पूरा मार्केटिंग का भार संभाला| आज वैशाली की उपज देश के हर कोने में बिकती है| 

किसान को अगर पारिवारिक सहयोग मिले तो वह बुलंदियों पर चढ़ सकता है|

किसान को बीज़ की महानता समझाने के  लिए चलाई नयी प्रथा

वैशाली ने समझा कि किसान को अपना बीज़ बैंक बनाना ही चाहिए| परन्तु अधिकतर किसान इसके लिए भी बाज़ार पर आश्रित हैं| वैशाली के अनुसार किसान को बाज़ारो पर आश्रित न होकर स्वावलम्बी तरीके से खेती करनी चाहिए, ऐसे में यह बहुत जरुरी है कि किसान के पास अपने उन्नत बीज़ हों|

वैशाली किसानो और उनके परिवारों में होने वाली शादियों या दावतों में उपहार स्वरुप केवल उन्नत बीज़ की भेंट ही देती हैं जिससे किसान स्वावलम्बी हो सके|

इससे किसान को उपहार में वह मिलता है जिसकी उसे सबसे ज्यादा आवश्यकता है और इस प्रथा से बाकी लोग भी प्रभावित होकर बीज़ ही भेंट करते हैं|

महिलाओं के उत्थान पर भी है जोर 

वैशाली बताती हैं कि खेती आपको बहुत सारे तरीके देती है लोगों की मदद करने के लिए| ऐसे ही एक तरीके से वैशाली आस पास की औरतों का समूह बना के उन्हें ट्रेनिंग के साथ साथ स्वावलम्बी बनने की राह पर अग्रसर कर रहीं हैं| वैशाली बताती हैं कि वे अपने खेत में महिलाओं से ही काम करवाना पसंद करती हैं क्यूंकि इससे महिलाओं में काम करने और पैसे कमाने का भरोसा आता है और साथ ही वे उसका सदुपयोग भी करती हैं|

पोषण प्रबंधन

वैशाली बताती हैं कि हमारी मिटटी में ही (अगर जैविक कृषि कर रहे हो) सारे पोषण होते हैं परन्तु फिर भी हमें मेहनत करनी होती है सूक्ष्म जीवाणु  बढ़ाने के लिये| देसी गाय का गोबर और मूत्र जीवाणु की संख्या बढ़ाने में अत्यंत लाभकारी होते हैं| जैसे जैसे मिटटी अच्छी होती जाती है उसमे केचुएं स्वतः ही आते हैं|  और केचुएं धरती के 50 फ़ीट नीचे तक जाकर चट्टान खाते हैं जिससे मिटटी में पोषण आता है|

अगर किसान जैविक शुरू करना चाहता है तो मिटटी की जांच जरूरी नहीं है अपितु उसमे केचुएं उपजाने आवश्यक है| मिटटी की जांच हालांकि सर्टिफिकेशन के लिए जरूरी है|

इसके साथ साथ वैशाली अलग अलग तरह के अर्क बना कर धरती में पानी के बहाव के साथ देती हैं

 

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