उन्नत कवि सम्मेलन – Oct 2020

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आदित्य – ये शाम भी गुज़र जाएगी 

ये शाम भी गुज़र जाएगी
ज़िन्दगी फिरसे और एक नया लक्ष्य बनाएगी
कुछ परिस्थितियों को फिरसे दोहराएगी
ये शाम भी गुज़र जाएगी

फिरसे इसी इंतज़ार में की तुम आओगे
फिरसे मेरे साथ आँखों में आँखें देख समय बिताओगी
इसी इंतज़ार में,
ये शाम भी गुज़र जाएगी

ख़ुशी के पल ढूंढ़ने निकलोगे,
एक नहीं सौ मुश्किलों से लड़ बैठोगे,
थक के हार के जब ख़ुशी ढूंढ लोगे
फिर ये शाम भी गुज़र जायेगी

हम सब में एक हलचल है
हम ढूंढ रहे कुछ हर पल हैं,
अगर मिल जाये तो बतला देना
उस समय को फिरसे लौटा देना
क्यूंकि समय से कोई महान नहीं
तो वक़्त का सही इस्तेमाल कर
क्यूंकि, ये शाम भी निकल जायेगी

इस आपाधापी का क्या फायदा,
इस शोर शराबे में क्यों जीना,
रख तलब ख़ुशी का अगर है रखना,
ना कि मोह रख तू दूसरी चीज़ों का,
ये शाम भी निकल जायेगी

ये समझ सके तो समझ ले मित्रा,
क्यूंकि, ये शाम भी निकल जायेगी

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