इंदौर के ये भाई बहन बढ़ा रहे हैं किसानो के लिए मार्किट

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कंप्यूटर इंजीनियरिंग करने के बाद राहुल एक मल्टीनेशनल कंपनी में बतौर सॉफ्टवेयर इंजीनियर काम कर रहे थे| परन्तु बार बार यही सोच में डूबे हुए थे कि क्या वे पूरी ज़िन्दगी यही करना चाहतें हैं| उसके बाद शुरू हुआ राहुल का अपने आप से बात करने का दौर और organic से जुड़ने का संघर्ष| राहुल की माताजी का देहांत कैंसर की वजह से हुआ तो राहुल और उनकी बहन वैशाली, जो की उस समय यूथोपिया में कार्यरत थीं, ने ठाना की कैंसर की जड़, जो हमारे रासायनिक भोजन से जुडी है, को ही ख़त्म करना है| फिर ऐसे भाई बहन जिन्होंने 30 साल से पहले कभी भी खेती नहीं करी उन्होंने जिम्मेदारी उठाई जैविक खेती करने की और साथ साथ जैविक खेती को बढ़ा कर किसानो की मदद करने की|

आज वैशाली 10 एकड़ में खेती करती हैं और उन्नत एवं प्रगतिशील किसान की श्रेणी में आती हैं और राहुल उनकी मार्केटिंग और सप्लाई चैन सँभालते हैं जिससे उनके प्रोडक्ट पूरे देश भर में सप्लाई किये जाते हैं| इन्होने माँ रेणुका फूड्स प्राइवेट लिमिटेड (www.mrnss.com) के नाम से एक कंपनी भी बनायीं है और उसी के तहत प्रोडक्ट्स सप्लाई करते हैं|

जैविक यात्रा के दौरान OIS (Organic India Story) टीम को मौका मिला राहुल से मिलने का, जिन्होंने अपनी जैविक यात्रा और संघर्ष यात्रा के बारे में हमे विस्तार से बताया|

राहुल बताते हैं कि अब लोग धीरे धीरे जैविक अन्न के बारे में जागरूक हो रहे हैं तथा उससे होने वाले स्वास्थ लाभों के चलते उनका रुझान जैविक उत्पादों की तरफ बढ़ता जा रहा है| बाकी लोगों को भी समझना होगा कि खेती में व्यापार के बढ़ते इतनी कुरीतियां आगयी हैं कि इंसान जिसे सब्जी समझ कर खा रहा है ताकि उसकी सेहत बने वही सब्जी उसकी सेहत बिगाड़ने का काम कर रही है क्यूंकि उसमे बहुतायत में रसायन हैं|

राहुल के हिसाब से 130 करोड़ की आबादी वाले देश में ऑर्गेनिक की डिमांड केवल लगभग 10 करोड़ लोगो से आती है| परन्तु जागरूकता दिन प्रतिदिन बढ़ रही है| जैविक अन्न के बारे में लोगों को यह दिक्कत हो सकती है कि यह उत्पाद महंगा होता है जो कि सच है क्यूंकि देसी बीजों से जैविक उगाने में यील्ड थोड़ी तो घटती है| परन्तु इसमें सर्टिफिकेशन का खर्चा भी होता है जिससे जाहिर सी बात है कि कॉस्ट बढ़ेगी| तो इसमें सरकार हेल्प कर सकती है किसान की ताकि जैविक उत्पादों की कीमत कम हो सके|

शुरुआती संघर्ष

सॉफ्टवेयर इंजीनियर बन कर कोडिंग करना मेरा पैशन नहीं था यह कुछ ऐसा हो रहा था कि जिंदगी मुझे धकेले जा रही थी और मैं समय काट रहा था| माताजी के कैंसर से देहांत के उपरांत मेरी बहन ने यूथोपिया से नौकरी छोड़ कर खेती करना शुरू किया ताकि लोगों को जागरूक किया जाए रासायनिक खीती के दुष्परिणाम के बारे में और साथ साथ उन्हें अच्छा अन्न उपलब्ध कराया जाए| मैं भी उनके इस मिशन का हिस्सा बना|

शुरुआती दौर में हमारी काफी फसल खराब हुई यानी पकी फसल, क्यूंकि हम उसे मार्किट नहीं कर पाए| फिर मैंने पूरा सप्लाई चैन और मार्केटिंग का जिम्मा उठाया और दीदी ने खेती का| उससे हमे काफी सीखने को भी मिला|

फार्मर्स मार्किट और आर्गेनिक मेलों से हमारे काफी अच्छे लिंक्स बने

शुरू शुरू में पूंजी का काफी बड़ा मुद्दा था क्यूंकि उसका अभाव था और हमें पता भी नहीं था कि जो पूंजी हमारे पास है कैसे उसका उपयोग करें| हमने मार्किट को पूरा स्कैन किया तो सबसे बड़ा मुद्दा जो किसान के पास आता है वो है मार्किट लिंकेज का| इसीलिए हमने उसपर काफी काम करना शुरू किया|

हमने अपने मॉडल में एक परिवर्तन और किया कि पैसो से रेवेन्यू का हिसाब लगाने के बजाये हम अपनी ग्रोथ को क्वांटिटी सप्लाईड से मापने लगे|

क्यूंकि जैसे जैसे क्वांटिटी बढ़ेगी मुनाफा बढ़ना स्वतः चालु होगा और इससे दिमाग पर ज्यादा स्ट्रेस नहीं आएगा| हमने 2019 जनवरी से शुरू किया था तो अब तक (2020 जनवरी) हम लगभग 130 टन माल बेच चुके हैं|

आज अगर हमसे कोई रिटेल में भी कुछ लेने आता है तो हम उसे बल्क के दाम में ही देते हैं|

किसानो का ग्रुप बना कर किया मार्किट लिंकेज का काम

देखिये आज के टाइम में भी अगर सरकारी इंस्टिट्यूट की बात करें किसान को लेकर तो किसान के पास अपना माल बेचने की केवल दो ही जगह हैं या तो सरकारी मंडी या सरकारी सोसाइटी परन्तु ना ही जैविक मंडी का कोई प्रावधान है और ना ही जैविक सोसाइटीज का| सरकारी एम् इस पी (MSP) में भी दिक्कत होती है क्यूंकि सरकार किसान का सारा माल नहीं लेती बल्कि कुछ हिस्सा ही लेती है और बाकी फसल किसान को मंडी में औने पौने भाव में ही बेचना पड़ता है| तो इस मामले में सरकारी मदद तो नहीं है किसान के पास इसलिए किसान को खुद ही आगे बढ़ना होगा|

आज के परिपेक्ष में किसान को यह फायदा है कि आर्गेनिक सामान बेचने वाले काफी स्टोर्स खुल गए हैं जो कि  सीधा किसान से माल उठाते हैं इससे बिचौलियों की संख्या कम होती है और किसान को अच्छा मूल्य मिलता है| हम भी सीधा कंस्यूमर को देने के बजाये इन स्टोर्स पर ही सप्लाई भेजते हैं| हमने किसानो का एक ग्रुप भी त्यार किया है जिससे हम ज्यादा से ज्यादा किसानो का माल इन स्टोर्स पर भिजवा सकें| आज हमारे साथ लगभग 400 किसान जुड़े हुए हैं|

कैसे त्यार किया किसान को जैविक के लिए

यह बहुत बड़ा मुद्दा था कि अपने साथ साथ बाकी किसानों को प्रेरित करना जैविक खेती के लिए बहुत मुश्किल काम रहा| एक किस्सा बताता हूँ जहाँ हम एक रास्ते में जा रहे थे तो वहां पर एक किसान मिला और हमने उससे कहा कि आप अपने सारे खेत में यूरिया DAP डाल रहे हैं, आप 1 बीघा जमीन छोड़ दीजिये जहाँ आप केवल अपने घर के लिए खाना उगाओ| हमारे सामने बात मानने पर जब हम लौट के उसके खेत पर आये तो उसने वो 1 बीघा धरती नहीं छोड़ी थी| किसान डरता है थोड़ा सा लीग से हट कर खेती करने में|

किसान सारा हिसाब अपने प्रोडक्शन पर आधारित करता है परन्तु वह यह नहीं देखता कि उसकी इनपुट कॉस्ट क्या रही, इससे उसकी गणित गड़बड़ा जाती है|

किसान यह नहीं सोचता कि भले ही उसकी प्रोडक्शन कम हो परन्तु इनपुट कॉस्ट कम हो और रेट ज्यादा मिलेगा तो उसको फायदा होगा|

तो धीरे धीरे हमने किसान को रोल मॉडल दिखाना चालू किया और फार्म विजिट करनी चालू की जिससे हमारा नेटवर्क बना| फिर उससे हमे किसान कि सच्चाई का भी पता चल जाता था और आज हमारे नेटवर्क में केवल वो किसान हैं जो पूरी मेहनत लगन और सच्चाई के साथ जैविक कृषि कर रहे हैं|

जानिये एक और नारी की जैविक किसान बनने की कहानी  

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