ऑर्गेनिक टूरिज्म को बढ़ावा देने वाले कान सिंह निर्वाण जी के साथ साक्षात्कार

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कान सिंह निर्वाण जी कृषि में अपने नए एवं क्रांतिकारी विचारों के लिए जाने जाते हैं| वे न केवल विचारों को स्पष्ट रूप से समझते एवं रखते हैं बल्कि विचारों को हकीकत में बदलना भी बखूबी जानते हैं| कान सिंह निर्वाण जी को उनके किसान उत्थान एवं जैविक खेती में योगदान के लिए बहुत से प्रदेश एवं राष्ट्रीय पुरुस्कारों से सम्मानित किया गया है| वे देश के चुने हुए रोल मॉडल में शामिल हैं जहाँ देश और विदेश से लोग आकर कान सिंह निर्वाण जी से जैविक खेती के गुण सीखते हैं|

साथ ही कान सिंह जी ऑर्गेनिक टूरिज्म को बढ़ाने की दिशा में तत्पर हैं एवं उन्होंने ऑर्गेनिक टूरिज्म के लिए भी अपने निवास स्थान पर एक रोल मॉडल खड़ा किया हुआ है जहाँ देश भर से लोग आकर प्रकृति की गोद में सुकून पाते हैं|

कान सिंह निर्वाण जी से मिली हमारी OIS (ऑर्गनिक इंडिया स्टोरी) की टीम और उनसे काफी विषयों पर हुई खुल के चर्चा:

OIS: हम बहुत से शिविरों में जाते हैं जहाँ हमे पता चलता है कि रसायन से पहले और बहुत सालों से भारत में केवल प्राकृतिक या गौ आधारित कृषि ही होती थी| तो फिर बीच में ग्रीन रिवोल्युशन की जरुरत क्यों पड़ी?

कान सिंह जी: बहुत अच्छी बात पकड़ी है आपने| ये सब इस देश में बेईमानी को बढ़ाने के तरीकों में शामिल है| और इन सब तरीकों से किसान को काफी हानि होती है| क्यूंकि किसान अगर जिन्दा रहता है और ताकतवर बनता है तो सरकारों को डर लगता है| कोई भी सरकार यह नहीं चाहती कि इस देश का किसान समृद्धिशाली और मजबूत बने|  और किसान का दुर्भाग्य यह रहा कि वो किसानी को समझ ही नहीं सका, उसके गुणों को भूलता चला गया और यह सब षड़यंत्र पूर्वक तरीके से सिस्टम के तहत किया गया| बार बार कहा गया कि किसान को किसानी व्यापार की तरह करनी चाहिए तो लोग धरती के धर्म को भूल गए और व्यापार में उतर गए| दुर्भाग्य से इन षड़यंत्रकारियों ने मिलकर आज धर्म और माँ बाप को भी व्यापारिक विषय बना दिया है और हर चीज़ को अब हमने व्यापारिक दृष्टिकोण से देखना शुरू कर दिया है| तो इस षड़यंत्र को हमे समझना पड़ेगा तब जाके पूरी प्रकृति समझ में आएगी| हमे समझना पड़ेगा की रसायनो को बढ़ावा इसलिए दिया गया क्यूंकि वैज्ञानिको को इन पर कमीशन मिलता है| बाहर की रासायनिक कंपनियां अपने प्रोडक्ट को बढ़ावा देने के लिए इन्हे पैसे देते हैं|

ये व्यापारी पना जब तक किसान बंद नहीं करेगा, आकंठ होकर के डूबेगा नहीं तब तक धरती नहीं समझ आएगी

OIS: शिविरों में हम देखते हैं कि जैविक ज्ञान सीखने बहुतायत में लोग आते हैं परन्तु हमे पता लगा कि वहां से लौटने के बाद दो प्रतिशत (2%) लोग भी असल में जैविक कृषि नहीं करते, ऐसा क्यों होता है ?

कान सिंह जी: आप देखिये आज मजाक सी हो रही है मानो कथा वाचक कथाएं कर रहे हैं और लाखो की संख्या में श्रोताओं की भीड़ उन्हें सुन रही है| ये कथावाचक अपनी कथाओं में जिन महापुरुषों का वर्णन करते हैं उनके जीवन का एक प्रतिशत हिस्सा भी इन कथा वाचकों ने जिया नहीं होता| ये कथावाचक बीस हजार की ड्रेस पहनकर और बीस लाख की गाडी से उतर कर उन महापुरुषों को व्यतांत सुनाते हैं जिन्होंने जंगलों में कड़ी तपस्या की| और यही दशा है उन श्रोताओं की| जैविक में भी यही हो रहा है और जैविक सेमिनारों की भी यही दशा है| 

ऑर्गेनिक के सेमीनार जो लोग करवा रहे हैं उनमे से अधिकांशतः (सब नहीं) वो लोग हैं जो कभी कभार खेत से निकलते हैं और श्रोता (अधिकांशतः) भी वो लोग हैं जो कभी कभार खेत में जाते हैं और किसानी का टैग लगा कर घूमते हैं|

ये तथाकथित किसान हैं जो लोगों से खेती करवाते हैं और किसानी का लाभ लेने के लिए आतुर हैं| खेत में काम करने वाले और जमीन से बात करने वाले किसानों की संख्या तो लगभग एक प्रतिशत ही होगी इन सेमिनारों में| और यही वो लोग हैं जो वापस जाकर जैविक खेती कर पाते हैं| इसीलिए धरातल पे बातें उतरने में समय लगता है|

सरकार अपनी नीति ठीक करे और किसान अपनी नियत ठीक करे तभी सब का भला होगा वरना कुछ नहीं होगा|

OIS: हम अपने वेबसाइट के माध्ययम से जैविक कृषि में किसान (कृषि नायक) की संघर्ष यात्रा के बारे में बताते हैं, तो जब आपने सोलह सत्रह साल पहले जैविक खेती शुरू की तब आपको किस किस तरह के संघर्षों का सामना करना पड़ा यानी आपकी शुरुआती संघर्ष की क्या कहानी है|

कान सिंह जी: मैं भी जैविक में उतरा पहले और बिना जानकारी के मुझे दो तीन साल काफी नुक्सान हुआ|

मेरे पिता ने बाकि घरवालों से कहा कि जब मैं घर में न हूँ तो यूरिया डालो खेत में, नहीं तो यह भूखा मारेगा|

फिर मैं सुभाष पालेकर जी के संपर्क में आया उनको देखा और समझा| परन्तु मैंने जाना कि जब तक धरती की भाषा समझ नहीं आएगी तब तक कुछ नहीं हो पायेगा| धीरे धीरे मेने धरती के साथ संवाद शुरू किया तो मुझे इसकी भाषा समझ आने लगी| उसके बाद मेरे अपने अनुसंधान और शोध आये जिसे मैंने अपनी कृषि में सम्मलित किया| धीरे धीरे जब मुझे गाय के गुण समझ में आये तो मेरे पुरे जीवन का बेस गाय बन गयी और इसी के बाद मैंने पूरा मॉडल गौ आधारित जीवन पद्धति पर खड़ा किया|

मैं पत्थर में भगवान् नहीं ढूंढ़ता बल्कि गाय में ढूंढ़ता हूँ| एक गाय को समझने से पूरी सृष्टि समझ में आजायेगी|

OIS: आप 35 एकर में खेती करते हैं तो आपको पुरे खेत में गौ आधारित कृषि को बढ़ाने में कितना समय लगा?

कान सिंह जी: नहीं कुछ समय नहीं लगा| आप बेस बराबर कर दो यानी जितना पोषण आप रसायन से दे रहे थे उतना ही पोषण आप जैविक के माध्यम से देदो, तो समय नहीं लगेगा| हाँ दोनों खाद की मात्रा में अंतर हो सकता है| आज जैविक गुरुओं ने बहुत बड़ा भ्रम जाल फैला दिया है कि मिटटी के जांच कराओ, उर्वरक ऊपर से डालो ये सब सफ़ेद झूठ है| धरती सम्पूर्ण है और इसमें पौधे के लिए आवश्यक तत्व भरे पड़े हैं परन्तु वो जड़ो के अनुरूप नहीं होते|

पोषक तत्वों को जड़ो के अनुरूप करने और पौधे तक पहुंचाने का काम सूक्ष्म जीवाणु का होता है| अच्छी मिटटी का अभिपर्याय ही उसमे सुक्ष-जीवाणु बाहुल्य होता है|

सूक्ष्म जीवाणु जमीन से खुराक उठा कर पौधे की जरुरत के अनुसार उस तक पोषण पहुँचाने का काम करते हैं|

और सूक्ष्म जीवाणु को बढ़ाने का काम सिर्फ देसी गाय का गोबर और मूत्र करते हैं| बस इतना सा विज्ञान है|

OIS: ये जो कृषि वैज्ञानिक हैं ये तो कभी भी ऐसा नहीं बताते अपितु काफी प्रोडक्ट्स बनाने और किसान को देने में लगे होते हैं, ऐसा क्यों?

कान सिंह जी: इन वैज्ञानिकों को अनुसंधान हेतु जमीन दी गयी थी, ये अपनी जमीन तक का स्टैण्डर्ड रख नहीं पाए तो ये किसान की जमीन को कैसे सुधारेंगे| क्यूंकि वे जमीन की और प्रकृति की भाषा ही नहीं जानते| इन्होने प्रोडक्शन की तो बात की लेकिन क़्वालिटी का क्या| खेती खराब करके इन्होने देश को नपुंसक बना दिया| आज किसी नौजवान को 3 किलोमीटर चलने को कहो तो बात सुनकर ही पसीने छूटते हैं|

मैं चैलेंज करता हूँ कि इन साठ सत्तर सालों में इस देश के किसी भी वैज्ञानिक ने अपनी भाषा के दस प्रतिशत ज्ञान को भी किसी किसान के मुँह से कहलवाया हो

मेरी किसी वैज्ञानिक से कोई लड़ाई नहीं है लेकिन तुम विदेशी ज्ञान रट कर हमे रटाना चाहते हो, यह हमें स्वीकार नहीं हैं| हमारे अपने अनुसंधानों को प्रमाणित करो और हमारी अपनी फसलों एवं जलवायु पर रिसर्च करो और वो किसान को दो तब बने कुछ बात| तुम भी हमारे साथ काम करो और हम भी तुम्हारे साथ काम करें|

परन्तु अगर तथाकथित ज्ञानी किसान के बोस बनते हैं और किसान जो प्रकृति के सबसे नज़दीक है उसे अनाड़ी कहते हैं तो सबसे बड़े अनाड़ी और मुर्ख स्वयं आप ही हैं|

OIS: क्या किसान जैविक खेती के साथ साथ आर्गेनिक टूरिज्म में भी योगदान कर सकता है?

कान सिंह जी: इस विषय में मैं थोड़ा विस्तार से बताऊंगा| देखो इस दुनिया में फिलहाल जो टूरिज्म का तरीका चल रहा है वह ज्यादा देर तक चलने वाला नहीं है| क्यूंकि आज के जो नौजवान हैं वह 5 स्टार या 7 स्टार होटल में जाकर बंधा या कैद महसूस करते हैं| उस माहौल में उन्हें बहुत सोचना पड़ता है क्यूंकि आप कितनी तेज़ आवाज में बोलोगे और किस तरह से खाना खाओगे यह पूर्व निर्धारित है और उससे थोड़ा भी अलग करने से आप एकदम सब की नज़र में असभ्य हो जाते हो|  तो ये टूरिज्म तो बदलेगा|

आज का नौजवान पाबन्दी में न जी कर स्वच्छंद जीवन जीना चाहता है और ऐसा जीवन जीने का तरीका केवल और केवल प्रकृति में विद्यमान है| और प्रकृति केवल फार्म टूरिज्म में किसान के पास ही है|

तो अगर टूरिज्म को जिन्दा रखना है तो इस सेक्टर को बढ़ाना पड़ेगा और सरकार को इस तरफ ध्यान देना होगा| मैंने ऑर्गेनिक टूरिज्म का एक मॉडल खड़ा किया है जहाँ दंपत्ति आते हैं और रात को रुकते हैं किराया देते हैं और सुबह सारा फार्म देख कर हमारे प्रोडक्ट खरीद ले जाते हैं| तो किसान को इसमें मार्केटिंग का भी फायदा होता है|

हमे फैमिली डॉक्टर को छोड़ कर फैमिली किसान के कांसेप्ट पे आना होगा

जानिये कैसे ये किसान करता है हवन खेती 

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