1992 से जैविक कृषि कर बलबीर जी रु 8000 क्विंटल तक बेचते हैं अपने गेहूं

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जैविक यात्रा के दौरान, OIS (Organic India Story) टीम मिली झुंझुनू जिले में नवलगढ़ तहसील के कारी गाँव में 1992 से गौ आधारित खेती कर रहे बलबीर जी से| बलबीर जी अपने एरिया में प्रोग्रेसिव (उन्नतिशील) किसानों की श्रेणी में आते हैं| इन्हे विशेष बनाता हैं इनका गौ आधारित कृषि करने का जज़्बा एवं उसमे निरंतर प्रयोग एवं इस पद्दति को बढ़ाने का जोश|

बलबीर जी अपने खेत में किसानी एक वैज्ञानिक की तरह करते हैं| नए नए यन्त्र बना कर उन्होंने गौ मूत्र से एक ही दिन में अलग अलग चीज़ों का (आंवला, नीम, सत्यानाशी इत्यादि) अर्क बनाने में सफलता हासिल की है| इन अविष्कारों एवं उनके प्रयोगों से वो अपना काफी समय एवं धन बचा पाते हैं और साथ ही पौधों को पौष्टिकता प्रदान कर पाते हैं| बलबीर जी का विश्वास है कि जितना जरूरी पौधों को जड़ो से खाना मिलना है उतना ही जरुरी उसे ऊपर से मिलना है| 

पौधे मात्र 5% (पांच प्रतिशत) भोजन मिट्टी से लेते हैं बाकी 95% वह ऊपर से यानी हवा और पत्तियों के माध्यम से लेते हैं| इसीलिए जरुरी है की ड्रिप के साथ साथ फव्वारे का प्रयोग हो जिसमे पोषण एवं कीट प्रबंधन के लिए घोल मिलाये जाये|

शुरूआती संघर्ष

बलबीर जी बताते हैं कि शुरूआती दौर में उन्हे रासायनिक से जैविक पर शिफ्ट करने में काफी दिक्कतें आयीं| ये दिक्कतें फसल या प्रोडक्शन को लेकर इतनी नहीं थी जितनी जैविक खेती की जानकारी और घरवालों समेत समाज के सहयोग को लेकर थीं| आसपास जैविक खेती के जानकारों के ना होने के कारण बलबीर जी को जैविक कृषि ज्ञान के लिए काफी घूमना पड़ा|  उन्होंने 1990 से लेकर 1992 तक रसायन मुक्त खेती करने का ज्ञान अर्जित किया और यह पाया कि जैविक कृषि में भी अगर मार्किट से लेकर प्रोडक्ट डालने पड़ें तो किसान को काफी नुक्सान होता है| इसीलिए उन्होंने शुरुआती दौर से ही गौ आधारित कृषि अपनायी| अपने आप ही प्रयोग करके समझे खेती का ज्ञान जिससे आगे के प्रोयोगो में सफलता आयी|

माँ को लगता था कि गौ से खेती नहीं हो पायेगी इसीलिए वो पीछे से पड़ोस के यहाँ से यूरिया ला कर छिड़क देती थीं| पिताजी को लगता था कि मैं भूखा मरूंगा|

मार्किट लिंकेज एक समस्या थी जिसे उन्होंने स्वयं एक प्रगतिशील किसान की भाँती सुलझाया| 1992 में जबकि जैविक खाद्यान के बारे में काफी कम लोग जानते थे तब उन्होंने अपने गेहूं, सरसों, तरबूज़ एवं अन्य फसलों की मार्केटिंग शुरू की। वे लोगों को अपने यहाँ बुलाते थे, लोगों के पास जाकर अपनी फसल के सैंपल देके आते थे| जिससे धीरे धीरे उनका कस्टमर पर सीधा संपर्क जुड़ गया और अब उन्हें फसल को मार्किट करने की जरुरत नहीं पड़ती बल्कि लोग खुद उनसे फसल लेने आते हैं|

“गौ आधारित कृषि बिलकुल भी मुश्किल नहीं है| आज मेरे गाँव के 40 किसान इस पद्दति पर खेती कर रहे हैं| और उन्हें मैं निशुल्क ट्रेनिंग भी देता हूँ”

“आज मेरा गेंहू रु 8000 क्विंटल तक बिकता है और तरबूज़ रु 25 प्रति किलो तक जाता है, क्यूंकि मैं सीधा ग्राहक को बेचता हूँ और एकदम शुद्ध माल”

पोषण प्रबंधन के लिए गौ मूत्र का अर्क

बलबीर जी द्वारा उपयोग में लाये जाने वाले बहुत से प्रोयोगों में से गौ मूत्र से अर्क निकालने वाला यंत्र काफी रोचक, सरल और नवीन है| इस यन्त्र में लगभग 15 लीटर गौ मूत्र डाल कर उसमे आँवला/केला/सत्यानाशी इत्यादि डाला जाता है और फिर उसमे नीचे आग लगा कर रख दिया जाता है| धीरे धीरे वाष्पीकरण होने पर वाष्प दूसरे चैम्बर में चली जाती है जहाँ उसे फिर ठंडा कर तरल में बदल दिया जाता है| इस टेक्नोलॉजी से गौ मूत्र और अन्य चीज़ का अर्क निकालने के लिए 40-45 दिन तक इंतज़ार नहीं करना पड़ता बल्कि कुछ ही घंटो में यह प्रक्रिया पूरी हो जाती है|

40-45 दिन नहीं बल्कि कुछ घंटो में ही प्राप्त हो जाता है कभी ना खराब होने वाला गौ मूत्र का अर्क

इस तरह प्राप्त किया हुआ अर्क कभी खराब नहीं होता और लम्बे समय तक रखा जा सकता है| जब इस्तेमाल करना हो तो उसमे पानी और छाछ मिला कर ड्रिप के एवं फव्वारे के द्वारा खेत में दे दिया जाता है|

कचरा प्रबंधन

बलबीर जी कचरा प्रबंधन कर दो तरीके के खाद बनाते हैं: सूखा एवं गीला| सूखा खाद बनाने के लिए बलबीर जी ने जमीन में टैंक या गड्ढा न बना कर मेंढ़ बनायीं है जिसमे वे हरा कचरा डाल कर ऊपर से देसी गाय का गोबर का लेप देते हुए उसमे डीकम्पोज़र डाल देते हैं| जिससे वह 40-45 दिन में स्वतः ही खाद बनने लगती है|

गीले खाद को त्यार करने के लिए एक प्लास्टिक की टंकी में 200 लीटर पानी लेकर डीकम्पोज़र (कृषि विभाग की रु 20 की शीशी) डाला जाता है जो कि सूक्ष्म जीवाणु का कल्चर होता है| यह मिश्रण केवल सात दिनों में त्यार हो जाता है जिसमे फिर वीड जैसे गाजर घास डाल सकते हैं| ऐसा करने पर अगले 7 दिनों में हरा गीला खाद त्यार हो जाता है जो की पानी के साथ मिलाकर वेंचुरी (तीसरी तस्वीर) द्वारा खेत में दी जाती है|

घास / पौधा / खरपतवार जो किसी भी जानवर द्वारा नहीं खाया जाता है, पोषक तत्वों की दृष्टि से सबसे फायदेमंद है।

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